Ziyarat E Nahiya In Hindi «A-Z CONFIRMED»

इसे पढ़ने का सबसे उत्तम समय "अरबाeen" (चेहल्लुम) माना जाता है, जो इमाम हुसैन की शहादत के ४० दिन बाद आता है। हालांकि, इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान से पढ़ा जा सकता है, लेकिन कर्बला में इमाम के रौज़े के बिल्कुल पास (नाहिया) खड़े होकर पढ़ने का विशेष महत्व है।

ज़ियारत-ए-नाहिया सिर्फ एक प्रार्थना नहीं है, यह इमाम हुसैन (अ.स.) को लिखा गया एक प्रेम-पत्र है। यह वो आवाज़ है जो कर्बला के मैदान से नहीं, बल्कि शाम-ए-गरीबां (असीरों का काफिला) से निकली थी। जो कोई भी इसे दिल से समझता है, वह कर्बला को अपनी आँखों से देख लेता है।

आज ही इस ज़ियारत को डाउनलोड करें और मुहर्रम के दिनों में इसे पढ़ने की कोशिश करें।


नोट: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। ज़ियारत-ए-नाहिया का पूरा अरबी पाठ और सटीक हिंदी/उर्दू अनुवाद किताब "मफातीह-उल-जिनान" या विश्वसनीय इस्लामिक वेबसाइट्स से प्राप्त करें। ziyarat e nahiya in hindi

ज़ियारत-ए-नाहिया (Ziyarat-e-Nahiya) एक प्रसिद्ध ज़ियारत है जो इमाम हुसैन (अ.स.) के लिए पढ़ी जाती है। यह ज़ियारत हज़रत इमाम महदी (अ.त.फ.श.) द्वारा इमाम हुसैन (अ.स.) के स्मरण और उनकी शहादत की दुखद घटना के प्रति गहरी श्रद्धांजलि स्वरूप कही गई है। नीचे इस विषय पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट प्रस्तुत है:


आइम्मा (अ.स.) ने इस ज़ियारत की बहुत तारीफ़ बयान की है:

आपको कई किताबों और वेबसाइटों पर "ज़ियारत-ए-नाहिया फ़ारसी में" या अरबी में मिलेगी। हिंदी देवनागरी लिपि में इसकी लिप्यंतरित (transliterated) प्रतियां ऑनलाइन उपलब्ध हैं। आप चाहें तो पहले हिंदी अनुवाद पढ़कर अर्थ समझें, फिर अरबी या फारसी में पढ़ें। आइम्मा (अ

कुछ लोग गलती से इसे 'नाहिया' की बजाय 'नाहिया' (लंबी आवाज के साथ) पढ़ते हैं, जिसका अर्थ "हल्के क्षेत्र" होता है। ध्यान रखें: नाहिया का अर्थ है - 'तरफ' या 'दिशा', यानि दूर से अरज़ की गई ज़ियारत।

यह ज़ियारत मुख्य रूप से इमाम महदी (अ.त.फ.श.) से रिवायत की गई है और इसे 'मफातीहुल जिनान' जैसी प्रसिद्ध दुआ और ज़ियारत की पुस्तकों में शामिल किया गया है। इसे अल-इक़बाल (सैय्यद इब्न ताऊस) और बिहारुल अनवर (अल्लामा मजलिसी) जैसी प्राचीन शिया पुस्तकों में भी उल्लेखित किया गया है।

"ऐ मेरे आका! ऐ मेरे मौला! अगर दुनिया में मेरी कोई ताकत होती या मेरा कोई सहारा होता, तो मैं जरूर तुम्हारी मदद के लिए दौड़ा आता।" "सलाम हो तुम पर

(यह लाइन बयान करती है कि इमाम सज्जाद (अ.स.) कितना बेबस थे कि वह बीमारी के कारण जंग में नहीं जा सके।)

विषय: इस्लामी इतिहास एवं साहित्य (अज़ादारी) विषय: ज़ियारत-ए-नाहिया का ऐतिहासिक एवं भावनात्मक महत्व

"ऐ सलाम हो तुम पर, ऐ अबा अब्दिल्लाह अल-हुसैन (अ.स.)! ऐ मेरे पिता के पिता और ऐ सच्चे इमामों की निगाहों की ठंडक!"

"सलाम हो तुम पर, ऐ खून से लथपथ होंटों वाले, ऐ ऐसे शहीद जिनका काफन (कफन) तक नहीं बन पाया!"

"सलाम हो उन ईमान वालों पर जिन्होंने तुम्हारा साथ दिया और तुम्हारे लिए कुर्बान हो गए।"